अपनी कहानी लेकर मैं आई हूँ

तुम सब के दुखो को भी परख कर लाई हूँ,

क्यों ऐसा है होता

हर कदम पर मेरा साहस है खोता,

क्या बस यही मतलब है मेरी ज़िंदगी का

क्यों समाज देता है ऐसे लोगो को मौका,

घर मे अगर करती हूँ भक्ति

तो न समझना नष्ट हो गई मेरी शक्ति,

कलयुग की मै नारी हूँ

भले ही कम अहंकारी हूँ,

पर अपने सम्मान के लिये जीती हूँ

क्योंकि स्वाभिमानी हूँ,

है मेरी शक्ति मेरे हृदय मे गुप्त

पर न समझना में रहूंगी चुप,

अगर मै हूँ शांत समुन्द्र के पानी की तरह

तो विद्यावान भी हूँ ज्ञानी की तरह,

करो नारी का सम्मान

इसी के साथ मैं देती हूँ अपने शब्दों का विराम ।